Thursday, October 19, 2017
Thursday, October 12, 2017
प्रेरक प्रसंग : कैसे पहुंचे लोहिया मद्रास से कलकत्ता ?
- मिलन सिन्हा
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# डॉ. राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि के अवसर पर
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com
ब्रिटिश हुकूमत का दौर था. पूरे देश में स्वतंत्रता आन्दोलन का जोर था. ऐसे ही समय डॉक्टरेट की उपाधि से विभूषित लोहिया जी जब बर्लिन से पानी के जहाज द्वारा मद्रास पहुंचे तो उस समय उनके पास एक भी पैसा नहीं था. ऊपर से किताबों सहित उनका सारा सामान न जाने क्यों, रास्ते में ही जब्त कर लिया गया था. अब समस्या यह थी कि मद्रास से कलकत्ता कैसे पहुंचा जाय. जाने अचानक उनके दिमाग में क्या आया कि वे जहाज से उतर कर सीधे मद्रास से प्रकाशित अखबार ‘हिन्दू’ के दफ्तर में पहुंच गए. संपादक के पास पहुंच कर फर्राटे की अंग्रेजी में बोले, ‘मैं अभी-अभी बर्लिन से आ रहा हूँ और आपके उपयोग हेतु एक-दो लेख देने की इच्छा रखता हूँ.
संपादक ने अपरिचित नौजवान को एक पल ठीक से देखा और पूछा, 'कहां है लेख? दीजिए.’
‘कृपया कागज़-कलम दें, मैं अभी तुरन्त लिख देता हूँ ’ – लोहिया जी ने कहा.
संपादक जी अवाक. कारण पूछा तो मालूम हुआ कि कलकत्ता जाने के लिए पैसे चाहिए. कागज़-कलम मिलते ही लोहिया जी वहीं बैठकर लिखने लगे, बिना किसी रुकावट के जैसे कि लेख लिखने के लिए वे पहले से ही तैयार बैठे हों. संपादक जी के लिए यह बिलकुल नया अनुभव था.
कुछ ही देर में दो लेख लिखकर उन्होंने संपादक जी को दे दिए. दोनों लेख पढ़कर संपादक जी ने लोहिया जी की विद्वता एवं प्रतिभा का प्रमाण पा लिया. संपादक जी ने तुरन्त पारिश्रमिक के रूप में उन्हें पच्चीस रूपये दिए और साथ ही शाम को अपने घर साथ खाने का निमंत्रण भी.
(hellomilansinha@gmail.com)और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# डॉ. राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि के अवसर पर
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com
प्रेरक प्रसंग : इतिहास का अध्येता
- मिलन सिन्हा
राममनोहर लोहिया काशी के एक कॉलेज में इंटर की पढ़ाई कर रहे थे. सभी विषयों में उन्हें इतिहास ही सबसे प्रिय था. अतएव अपने पाठ्यक्रम की इतिहास की पुस्तकों के अलावा जो भी इतिहास की पुस्तकें उनके हाथ लग जाती उन्हें वे जल्दी ही पढ़ जाते. इतिहास की पुस्तकों के इस व्यापक अध्ययन का परिणाम यह हुआ कि उनकी दृष्टि समालोचक की हो गई. अब जहां भी वे कोई तथ्यहीन बात पढ़ते तो तुरन्त उसे गलत साबित करने में जुट जाते.
राममनोहर लोहिया काशी के एक कॉलेज में इंटर की पढ़ाई कर रहे थे. सभी विषयों में उन्हें इतिहास ही सबसे प्रिय था. अतएव अपने पाठ्यक्रम की इतिहास की पुस्तकों के अलावा जो भी इतिहास की पुस्तकें उनके हाथ लग जाती उन्हें वे जल्दी ही पढ़ जाते. इतिहास की पुस्तकों के इस व्यापक अध्ययन का परिणाम यह हुआ कि उनकी दृष्टि समालोचक की हो गई. अब जहां भी वे कोई तथ्यहीन बात पढ़ते तो तुरन्त उसे गलत साबित करने में जुट जाते.
उनके अपने पाठ्यक्रम में इतिहास की एक पुस्तक थी - 'ईसाई शक्ति का उदय'. इस किताब में एक स्थान पर कलकत्ते की एक काल कोठरी का वर्णन करते हुए भारतवासियों पर यह आरोप लगाया गया था कि उस काल कोठरी में एक सौ चालीस अंग्रेजों को एक साथ बंद कर उनकी हत्या की गयी थी. लोहिया जी को ये सब पढ़ते ही ऐसा लगा कि सारा वाकया तथ्य से परे है और इस तरह के प्रचार के पीछे भारत के लोगों को एन-केन-प्रकारेण बदनाम करने का उद्देश्य है. फिर क्या था, लोहिया जी ने इस मुद्दे को बहस के लिए सबके सामने रखा. बहस का लम्बा दौर चला और अंत में लोहिया जी ने यह साबित कर दिया कि उक्त पुस्तक में जिन एक सौ चालीस अंग्रेजों का जिक्र है, वे कभी इंग्लैंड से भारत आये ही नहीं. और तो और, जिस काल कोठरी का उस किताब में उल्लेख है उस कोठरी में किसी भी तरह एक सौ चालीस आदमी समा ही नहीं सकते. इतना ही नहीं, लोहिया जी ने उसी पुस्तक में छत्रपति शिवाजी को 'लुटेरा सरदार' लिखे जाने की बात को भी ठोस प्रमाणों द्वारा बेबुनियाद और झूठा साबित कर दिया.
# डॉ. राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि के अवसर पर
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com
(hellomilansinha@gmail.com)
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com
Sunday, October 1, 2017
यात्रा के रंग : गंगटोक और आसपास -5- अब शान्ति व्यू पॉइंट और ...
-मिलन सिन्हा
...गतांक से आगे... हल्का नाश्ता करने के बाद हम नीचे उतरने लगे तो राजू ने बताया कि इसी रास्ते में थोड़ी दूर पर विख्यात ‘जवाहरलाल नेहरु बोटानिकल गार्डन’ है. जल्द ही हम वहां पहुंच गए. यह गार्डन एक बड़े से परिसर में है, जिसका देखरेख सरकार का वन विभाग करता है. इस परिसर का माहौल खुशनुमा है. यहां आप अनेक प्रकार के आर्किड का आनंद ले सकते हैं. ओक सहित अन्य अनेक दुर्लभ प्रजाति के पेड़-पौधों के बीच वक्त कैसे गुजर जाता है, पता ही नहीं चलता.
रोचक तथ्य ये भी कि इतना पैदल चलने पर भी आप ज्यादा नहीं थकते, कारण रोजमर्रा की भागदौड़ की जिंदगी से इतर आपको प्रकृति के साथ वक्त गुजरना अच्छा लगता है और आप ऑक्सीजन अर्थात प्राण-वायु से भरे भी तो रहते हैं.
...गतांक से आगे... हल्का नाश्ता करने के बाद हम नीचे उतरने लगे तो राजू ने बताया कि इसी रास्ते में थोड़ी दूर पर विख्यात ‘जवाहरलाल नेहरु बोटानिकल गार्डन’ है. जल्द ही हम वहां पहुंच गए. यह गार्डन एक बड़े से परिसर में है, जिसका देखरेख सरकार का वन विभाग करता है. इस परिसर का माहौल खुशनुमा है. यहां आप अनेक प्रकार के आर्किड का आनंद ले सकते हैं. ओक सहित अन्य अनेक दुर्लभ प्रजाति के पेड़-पौधों के बीच वक्त कैसे गुजर जाता है, पता ही नहीं चलता.
रोचक तथ्य ये भी कि इतना पैदल चलने पर भी आप ज्यादा नहीं थकते, कारण रोजमर्रा की भागदौड़ की जिंदगी से इतर आपको प्रकृति के साथ वक्त गुजरना अच्छा लगता है और आप ऑक्सीजन अर्थात प्राण-वायु से भरे भी तो रहते हैं.
आगे हमारी गाड़ी “शान्ति व्यू पॉइंट” पर आ कर रुकी. इस स्थान से आप पूरे गंगटोक का एक बेहद खूबसूरत दृश्य देख सकते हैं. पहाड़ों के विस्तारित श्रृंखला में पूरे गंगटोक शहर और उसके आसपास फैले छोटे-बड़े इलाके का ऐसा विहंगम दृश्य शायद शान्ति व्यू पॉइंट से ही शान्ति और सकून से आप देख सकते हैं. सच कहें तो आप चाय की चुस्की लेते हुए घंटों यहाँ समय बिता सकते हैं. सो, हमने भी थोड़ा ज्यादा समय इस जगह के नाम किया, बेशक बीच-बीच में राजू की दिलचस्प आपबीती सुनते हुए.
सचमुच, यात्रा हमें बहुत कुछ दिखाती है, बहुत कुछ सिखाती-समझाती है. तभी तो कई बड़े लोगों ने अलग-अलग तरीके से कहा है : दुनिया एक बड़ी किताब है और वे जो यात्रा नहीं करते सिर्फ कुछ पेज पढ़ कर ही रह जाते हैं.
शाम हो चली थी. सड़क के दोनों ओर फैले प्रकृति के विभिन्न रूपों को निहारते हुए हम आ गए थे गंगटोक की ह्रदय स्थली महात्मा गांधी रोड के पास. हमने राजू से विदा ली, उसे गले लगाया, शुक्रिया कहा. राजू ने भी थैंक्स कहा और मुस्कुराते हुए बढ़ गया, कल फिर किसी और सैलानी को गंगटोक घुमाने की इच्छा के साथ – एक अच्छे गाइड की तरह. जीते रहो राजू....असीम शुभकामनाएं. ....आगे जारी...
# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com
(hellomilansinha@gmail.com)
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। # साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com
Wednesday, September 6, 2017
यात्रा के रंग : गंगटोक और आसपास -4 - आज प्रसिद्ध 'रूमटेक मठ'
-मिलन सिन्हा
...गतांक से आगे... आपको जानकर अच्छा लगेगा कि गंगटोक के आसपास कई प्राचीन धार्मिक मठ हैं, जो पर्यटकों एवं अनुयायियों के आकर्षण के केन्द्र रहे हैं . लेकिन किसी कारण से आप इन सभी मठों का दर्शन न भी कर सकें तो कम-से-कम प्रसिद्ध रूमटेक मठ जरुर जाएं, क्यों कि यह सिक्किम का सबसे बड़ा और चर्चित मठ है. यह भी एक कारण था कि हमारे दूसरे दिन के कार्यक्रम में रूमटेक मठ देखना शामिल था, साथ ही उसके आसपास के दर्शनीय स्थानों को देखना भी. ड्राईवर और गाइड राजू समय पर आ गया था. सो, सुबह–सुबह ही हम गंगटोक शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर अवस्थित इस मठ को देखने निकल पड़े. बताते चलें कि धर्मचक्र केन्द्र के रूप में विख्यात रूमटेक मठ करीब 300 साल पुराना है और तिब्बती वास्तुकला की बेहतरीन मिसाल है. यह करमापा लामा का मुख्य कार्य स्थान रहा है. यह मठ समुद्र तल से 5800 फीट की ऊंचाई पर है. कहा जाता है कि यह मठ तिब्बत स्थित मूल तिब्बती बौद्ध मठ का प्रतिरूप है, जिसका पुनर्निर्माण 1960 के दशक में 16 वें करमापा द्वारा करवाया गया.
...गतांक से आगे... आपको जानकर अच्छा लगेगा कि गंगटोक के आसपास कई प्राचीन धार्मिक मठ हैं, जो पर्यटकों एवं अनुयायियों के आकर्षण के केन्द्र रहे हैं . लेकिन किसी कारण से आप इन सभी मठों का दर्शन न भी कर सकें तो कम-से-कम प्रसिद्ध रूमटेक मठ जरुर जाएं, क्यों कि यह सिक्किम का सबसे बड़ा और चर्चित मठ है. यह भी एक कारण था कि हमारे दूसरे दिन के कार्यक्रम में रूमटेक मठ देखना शामिल था, साथ ही उसके आसपास के दर्शनीय स्थानों को देखना भी. ड्राईवर और गाइड राजू समय पर आ गया था. सो, सुबह–सुबह ही हम गंगटोक शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर अवस्थित इस मठ को देखने निकल पड़े. बताते चलें कि धर्मचक्र केन्द्र के रूप में विख्यात रूमटेक मठ करीब 300 साल पुराना है और तिब्बती वास्तुकला की बेहतरीन मिसाल है. यह करमापा लामा का मुख्य कार्य स्थान रहा है. यह मठ समुद्र तल से 5800 फीट की ऊंचाई पर है. कहा जाता है कि यह मठ तिब्बत स्थित मूल तिब्बती बौद्ध मठ का प्रतिरूप है, जिसका पुनर्निर्माण 1960 के दशक में 16 वें करमापा द्वारा करवाया गया.
पहाड़ी रास्ते से होते हुए हम करीब घंटे भर में रूमटेक मठ के मेन गेट के पास पहुंच गए. गाड़ी वहीं छोड़नी पड़ी. अन्दर जाने के लिए हम सबको अपना-अपना परिचय कार्ड दिखाना पड़ा, सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ा. पता चला कि सुरक्षा कारणों से यहाँ सुरक्षा कर्मी पूरे परिसर की चौबीसों घंटे कड़ी चौकसी करते हैं. मेन गेट से थोड़ी चढ़ाई करते हुए और एक कतार में लगे प्रार्थना चक्रों ( प्रेयर व्हील्स ) को घुमाते हुए हम मठ के मुख्य द्वार पर पहुंच गए. वहां सुरक्षा कर्मी हर श्रद्धालु की जांच कर उन्हें मठ में प्रवेश की अनुमति दे रहे थे. अन्दर का माहौल भक्तिमय था और पूरा दृश्य अभिभूत कर रहा था. सुबह का समय होने के कारण हमें बौद्ध भिक्षुओं द्वारा पूरे अनुष्ठानपूर्वक एवं परंपरागत तरीके से की जा रही प्रार्थना का गवाह बनने का सौभाग्य मिला. यह हमारे लिए एक अपूर्व अनुभव था. इस प्रार्थना में शामिल छोटे-बड़े करीब 30-35 भिक्षुओं की तन्मयता और अनुशासन देखने लायक थी.
प्रार्थना का कार्यक्रम समाप्त होने के बाद हम परिसर के अन्य भागों को देखने चले. मठ के दाहिने हिस्से से हम पीछे की ओर गए जहाँ ‘करमा श्री नालंदा इंस्टिट्यूट ऑफ़ हायर बुद्धिस्ट स्टडीज’ का खूबसूरत परिसर है. यह अनूठा शिक्षण संस्थान वाराणसी स्थित संस्कृत विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है और यहाँ युवा भिक्षुओं को बौद्ध दर्शन व इतिहास, तिब्बती साहित्य व कला के अलावे अंग्रेजी, हिन्दी, पाली, संस्कृत आदि भाषाओँ की शिक्षा दी जाती है. इस इंस्टिट्यूट में दुनिया भर से छात्र शिक्षा ग्रहण करने आते हैं. अध्ययनरत सभी भिक्षु यहीं छात्रावास में रहते हैं. इस परिसर के एक छोटे से हॉल में प्रसिद्ध स्वर्ण स्तूप भी है. कहा जाता है कि इसी स्थान पर 16 वें करमापा की पवित्र अस्थियां रक्खी गई हैं.
प्रार्थना का कार्यक्रम समाप्त होने के बाद हम परिसर के अन्य भागों को देखने चले. मठ के दाहिने हिस्से से हम पीछे की ओर गए जहाँ ‘करमा श्री नालंदा इंस्टिट्यूट ऑफ़ हायर बुद्धिस्ट स्टडीज’ का खूबसूरत परिसर है. यह अनूठा शिक्षण संस्थान वाराणसी स्थित संस्कृत विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है और यहाँ युवा भिक्षुओं को बौद्ध दर्शन व इतिहास, तिब्बती साहित्य व कला के अलावे अंग्रेजी, हिन्दी, पाली, संस्कृत आदि भाषाओँ की शिक्षा दी जाती है. इस इंस्टिट्यूट में दुनिया भर से छात्र शिक्षा ग्रहण करने आते हैं. अध्ययनरत सभी भिक्षु यहीं छात्रावास में रहते हैं. इस परिसर के एक छोटे से हॉल में प्रसिद्ध स्वर्ण स्तूप भी है. कहा जाता है कि इसी स्थान पर 16 वें करमापा की पवित्र अस्थियां रक्खी गई हैं.
परिसर में आते-जाते कई भिक्षुओं से हमें रोचक वार्तालाप का अवसर भी मिला. जानकारी मिली कि यहां से शिक्षित-प्रशिक्षित बौद्ध भिक्षु जीवनभर धार्मिक-सामाजिक-शैक्षणिक कार्य में खुद को समर्पित कर देते हैं. सच मानिए, शहर के कोलाहल एवं प्रदूषण से परे पहाड़ पर बसे एवं मनोरम प्राकृतिक परिवेश में समर्पित धर्म गुरुओं एवं विद्वानों से शिक्षित होना भिक्षुओं के लिए निश्चय ही सौभाग्य की बात है.
लौटने के क्रम में हमने मठ के निकट कुछ श्रद्धालुओं को शान्ति के प्रतीक ‘कबूतर’ को दाना खिलाते देखा. सैकड़ों की संख्या में कबूतरों को बेख़ौफ़ कई श्रद्धालुओं के हाथ से दाना चुगते देखा, शायद पास खड़े सुरक्षा कर्मी के कारण वे भी आश्वस्त थे, आशंका मुक्त थे. सचमुच, यह दृश्य हमें मंत्र-मुग्ध कर गया. इसी हर्षातिरेक में हम प्रार्थना चक्रों को घुमाते हुए रूमटेक मठ के गेट से बाहर आ गए. ...आगे जारी...
(hellomilansinha@gmail.com)
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com
# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com
Friday, September 1, 2017
यात्रा के रंग : गंगटोक और आसपास -3- अब बक्थांग वॉटरफॉल और ....
-मिलन सिन्हा
...गतांक से आगे... आप घूमने जाएं, वह भी घरवालों के साथ और फिर वहां कुछ खरीदारी न करें, यह नामुमकिन है. वह भी तब जब आप गंगटोक हस्तशिल्प एवं हैंडलूम प्रतिष्ठान में आ गए हों. यहाँ हैंडलूम के महिला कारीगरों को पूरी तन्मयता से काम करते हुए एवं कलात्मक चीजों का निर्माण करते हुए देख सकते हैं. देखने पर ही पता चलता है कि यह सब कितनी मेहनत एवं एकाग्रता की मांग करता है. इसके दूसरे हिस्से में एक तरफ हस्तशिल्प प्रदर्शनी लगी है तो दूसरे तरफ चीजें बिक्री के लिए उपलब्ध हैं. मेक इन इंडिया का अच्छा उदहारण. कलाप्रेमी एवं मानव श्रम को महत्व देने वाले लोगों के लिए यहाँ कुछ समय गुजारना एक अच्छा अनुभव साबित होगा.
यहाँ से बनझकरी जलप्रपात, ताशी व्यू पॉइंट, एंची मठ एवं लिंग्दुम मठ का भ्रमण करते हुए और बीच में मुसलाधार बारिश का लुफ्त उठाते हुए हम अब पहुंच गए हैं प्रसिद्ध बक्थांग वॉटरफॉल. यह खूबसूरत वॉटरफॉल वस्तुतः एकाधिक वाटर फॉल का एक समूह है. इस स्थान पर आप ‘रोप स्लाइडिंग’ का भी मजा ले सकते हैं. यहाँ सैलानियों की बहुत भीड़ होती है, कारण यह शहर के नजदीक है; मुख्य सड़क के बिलकुल पास अवस्थित है और बहुत आकर्षक भी है. सही है, पेड़ों से आच्छादित ऊँचे पहाड़ से एक साथ कई जल-प्रपात को नीचे आते देखना किसे विस्मत एवं मंत्र-मुग्ध नहीं करेगा. लिहाजा, यहाँ के प्राकृतिक दृश्यों को कैमरे में कैद करने में लोगों को मशगूल देखना बहुत ही स्वभाविक है. हाँ, कुछ राशि खर्च करके यहाँ आप सिक्किम के पारंपरिक लिबास में फोटो खिचवाने का आनंद उठा सकते हैं. बहरहाल, यहाँ से चलते वक्त स्वतः ही गुनगुना उठा मनोज कुमार एवं जया भादुड़ी अभिनीत चर्चित हिन्दी फिल्म ’शोर’ का वह कर्णप्रिय गाना – पानी रे पानी तेरा रंग कैसा....
यहाँ से बनझकरी जलप्रपात, ताशी व्यू पॉइंट, एंची मठ एवं लिंग्दुम मठ का भ्रमण करते हुए और बीच में मुसलाधार बारिश का लुफ्त उठाते हुए हम अब पहुंच गए हैं प्रसिद्ध बक्थांग वॉटरफॉल. यह खूबसूरत वॉटरफॉल वस्तुतः एकाधिक वाटर फॉल का एक समूह है. इस स्थान पर आप ‘रोप स्लाइडिंग’ का भी मजा ले सकते हैं. यहाँ सैलानियों की बहुत भीड़ होती है, कारण यह शहर के नजदीक है; मुख्य सड़क के बिलकुल पास अवस्थित है और बहुत आकर्षक भी है. सही है, पेड़ों से आच्छादित ऊँचे पहाड़ से एक साथ कई जल-प्रपात को नीचे आते देखना किसे विस्मत एवं मंत्र-मुग्ध नहीं करेगा. लिहाजा, यहाँ के प्राकृतिक दृश्यों को कैमरे में कैद करने में लोगों को मशगूल देखना बहुत ही स्वभाविक है. हाँ, कुछ राशि खर्च करके यहाँ आप सिक्किम के पारंपरिक लिबास में फोटो खिचवाने का आनंद उठा सकते हैं. बहरहाल, यहाँ से चलते वक्त स्वतः ही गुनगुना उठा मनोज कुमार एवं जया भादुड़ी अभिनीत चर्चित हिन्दी फिल्म ’शोर’ का वह कर्णप्रिय गाना – पानी रे पानी तेरा रंग कैसा....
यहाँ से हम आगे बढ़े प्रसिद्ध नामग्याल इंस्टिट्यूट ऑफ़ तिब्ब्तोलाजी की ओर. यह स्थान देवराली टैक्सी स्टैंड जो कि राष्ट्रीय उच्च मार्ग-31ए पर अवस्थित है, के निकट है. तिब्बती सभ्यता व संस्कृति का प्रमाणिक परिचय प्राप्त करना हो तो यहाँ आना सार्थक होगा. अपने स्थापना वर्ष 1958 से यह संस्था लगातार तिब्बत के लोगों के धर्म, भाषा, कला, इतिहास आदि से संबंधित अध्ययन तथा शोध-अनुसंधान में जुटा है. इसके पुस्तकालय एवं म्यूजियम में तिब्बती जन-जीवन से जुड़ी तमाम कलाकृतियों और पुस्तकों-पांडुलिपियों का विराट संग्रह है. शायद यही कारण है कि बड़ी संख्या में शोधार्थी, विद्यार्थी एवं पर्यटक इस संस्थान में आते रहते हैं.
सुबह से शाम तक के इस लोकल टूर का एक दिलचस्प पहलू यह रहा कि हमें राजू नामक एक खुश-मिजाज ड्राईवर –सह-गाइड मिला, अन्यथा इन महत्वपूर्ण दस पॉइंट का भ्रमण शायद ही यादगार बन पाता. दरअसल, राजू एक पढ़ा-लिखा नौजवान है जिसकी रूचि हर सम-सामयिक विषयों में है. राजनीति से लेकर फिल्म तक उसकी एक समझ है जिसे व्यक्त करने में उसे कोई झिझक नहीं, जैसा कि हम सामान्यतः अनेक संभ्रांत लोगों में पाते हैं. लिहाजा, जब राजू ने पूर्व मुख्यमंत्री की चर्चा की तो उसके साथ उनके समय की अच्छी-बुरी दोनों बातों का जिक्र किया, आम सिक्किमवासी के आशा-आकंक्षा के बारे में बताया. गंगटोक में बेरोजगारी की स्थिति पर जब मैंने उसके विचार जानने चाहे तो बेशक राजू थोड़ा गुस्से में आ गया. उसने शिक्षित बेरोजगारों की बात की और कहा कि उनके लिए स्व-रोजगार के अलावे रोजगार के विकल्प बहुत ही सीमित हैं. स्व-रोजगार भी पर्यटन से जुड़ा है, लेकिन पर्यटन को एक उद्योग के रूप में विकसित करने में सरकार अबतक सफल नहीं हो पाई है. पर्वतीय पर्यटन का एक अलग मिजाज होता है और एक सीमित अवधि. मसलन, गंगटोक में जाड़े के मौसम में पर्यटन से जुड़े सारे व्यवसाय बिलकुल सुस्त पड़ जाते हैं. नतीजतन, इन पर निर्भर एक बड़ी आबादी ठण्ड और बेरोजगारी के दोहरे मार को झेलने को मजबूर हो जाती है. एक और बात. यहाँ के युवा सेना और अर्द्ध-सैनिक बलों में जाना चाहते हैं, लेकिन वहां भी अनजाने कारणों से कुछ ही लोगों की बहाली हो पाती है. बड़े व्यवसाय में गैर-सिक्कमी लोगों, खासकर राजस्थानी, बंगाली एवं बिहारी लोगों के निरंतर बढ़ते वर्चस्व के प्रति भी उसने अपना रोष नहीं छिपाया. राजनीतिक भ्रष्टाचार को बढ़ाने में इन बाहरी लोगों की भूमिका को भी राजू ने रेखांकित किया.
सूर्यास्त हो गया था. हम अपने होटल लौट आए. राजू से हाथ मिलाया, उसे थैंक्स कहा और उससे अगले दिन सुबह समय पर पहुंचने का आग्रह किया. वह हंसा और ओके कहकर बढ़ गया अपनी गाड़ी के साथ. ...आगे जारी...
(hellomilansinha@gmail.com)
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com
# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com
Wednesday, August 30, 2017
यात्रा के रंग : गंगटोक और आसपास -2 - अब हनुमान टोक और ...
-मिलन सिन्हा
पेड़ों से भरे पहाड़ी रास्ते से होकर अब हम हनुमान टोक से करीब 1200 फीट नीचे गणेश टोक के पास आ गए हैं. घुमावदार सीढ़ियों से चढ़ कर इस मंदिर तक पहुँचते हुए आप प्रकृति के विविध रूपों का गवाह बनेंगे, साथ ही मौका मिलेगा गंगटोक शहर के एक कुछ हिस्सों के विहंगम दृश्य से रूबरू होने का. इस गणेश मंदिर के पार्किंग स्थल के बिलकुल पास में आपको खाने-पीने की सामग्री मिल जायेगी और हस्तशिल्प की कुछ खूबसूरत वस्तुएं भी. कई सीनियर सिटीजन जो शारीरिक कारण से ऊपर मंदिर तक नहीं जा पाते हैं, नीचे पार्किंग स्थल से भगवान गणेश को प्रणाम कर लेते हैं और ईश्वर का आशीर्वाद पाने की अनुभूति से खुश हो जाते हैं. चाय-पानी और अन्य खरीदारी बाद में करते रहते हैं. ...आगे जारी...
...गतांक से आगे... गाड़ी बढ़ चली अब अगले पॉइंट- हनुमान टोक यानी हनुमान मंदिर की ओर. गंगटोक शहर से करीब 10 किलोमीटर की दूरी एवं समुद्र तल से करीब 7200 फीट की ऊंचाई पर स्थित है यह खूबसूरत मंदिर. पार्किंग स्थल से मंदिर तक जाने के लिए सीढियां बनी है, जिसमें बीच-बीच में बैठने-सुस्ताने की व्यवस्था है. मंदिर के रास्ते में लगातार घंटियां लगी हैं, जिन्हें बजाते जाने पर ध्वनि की अदभुत गूंज-अनुगूंज से आप अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकते. सारा परिसर इतना साफ़-सुथरा एवं सुरुचिपूर्ण ढंग से सुसज्जित है कि आप स्वतः पूछ बैठेंगे कि ऐसा रख-रखाव तो सेना के देखरेख में ही संभव है. बिलकुल ठीक सोचा है आपने.
वर्ष 1968 से भारतीय सेना के माउंटेन डिवीज़न के जवान इस हनुमान मंदिर का रख-रखाव करते रहे हैं. इस स्थान से कंचनजंघा पर्वतमाला के अप्रतिम सौन्दर्य का आप आनन्द उठा सकते हैं. कहने की जरुरत नहीँ कि यहाँ आने पर आपको थोड़ा और रुकने का मन जरुर करेगा. लेकिन आगे और भी तो बहुत कुछ देखना है और घड़ी कहाँ तक आपको रुकने देगी. हाँ, एक और जानने योग्य बात. वर्षों से प्रचलित लोकमत के अनुसार राम-रावण युद्ध के दौरान आहत पड़े लक्ष्मण के लिए हिमालय से संजीवनी बुटी ले जाने के क्रम में हनुमान जी कुछ देर के लिए इस स्थान पर रुके थे.
वर्ष 1968 से भारतीय सेना के माउंटेन डिवीज़न के जवान इस हनुमान मंदिर का रख-रखाव करते रहे हैं. इस स्थान से कंचनजंघा पर्वतमाला के अप्रतिम सौन्दर्य का आप आनन्द उठा सकते हैं. कहने की जरुरत नहीँ कि यहाँ आने पर आपको थोड़ा और रुकने का मन जरुर करेगा. लेकिन आगे और भी तो बहुत कुछ देखना है और घड़ी कहाँ तक आपको रुकने देगी. हाँ, एक और जानने योग्य बात. वर्षों से प्रचलित लोकमत के अनुसार राम-रावण युद्ध के दौरान आहत पड़े लक्ष्मण के लिए हिमालय से संजीवनी बुटी ले जाने के क्रम में हनुमान जी कुछ देर के लिए इस स्थान पर रुके थे.
पेड़ों से भरे पहाड़ी रास्ते से होकर अब हम हनुमान टोक से करीब 1200 फीट नीचे गणेश टोक के पास आ गए हैं. घुमावदार सीढ़ियों से चढ़ कर इस मंदिर तक पहुँचते हुए आप प्रकृति के विविध रूपों का गवाह बनेंगे, साथ ही मौका मिलेगा गंगटोक शहर के एक कुछ हिस्सों के विहंगम दृश्य से रूबरू होने का. इस गणेश मंदिर के पार्किंग स्थल के बिलकुल पास में आपको खाने-पीने की सामग्री मिल जायेगी और हस्तशिल्प की कुछ खूबसूरत वस्तुएं भी. कई सीनियर सिटीजन जो शारीरिक कारण से ऊपर मंदिर तक नहीं जा पाते हैं, नीचे पार्किंग स्थल से भगवान गणेश को प्रणाम कर लेते हैं और ईश्वर का आशीर्वाद पाने की अनुभूति से खुश हो जाते हैं. चाय-पानी और अन्य खरीदारी बाद में करते रहते हैं. ...आगे जारी...
(hellomilansinha@gmail.com)
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com
# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com
Subscribe to:
Posts (Atom)

