Wednesday, March 8, 2017

बातों-बातों में : पांच राज्यों में चुनाव के बहाने कुछ सवाल

                                                                                        - मिलन सिन्हा 
पांच राज्यों के चुनाव में अंतिम दौर का मतदान आज समाप्त हो गया. चुनाव परिणाम 11 मार्च को आयेंगे. कल से टीवी चैनल नतीजों का आकलन एवं भविष्यवाणी करने लगेंगे. चर्चा में भाग लेनेवाले राजनीतिक दलों के अधिकांश प्रवक्ता तो तथ्यों व प्रमाणित आंकड़ों तक को झुठलाते हुए पार्टी लाइन पर बोलते कम, चीखते-चिल्लाते ज्यादा नजर आयेंगे, उनके साथ पैनल में बैठे ज्यादातर पत्रकार-संपादक भी पूर्वाग्रह से प्रेरित बातें करते स्पष्ट नजर आयेंगे. एंकर तो ऐसे भी कार्यक्रम के लिए पहले से तय एजेंडे पर बने रहकर अपनी-अपनी नौकरी कर रहे होंगे. कमोबेश हर राष्ट्रीय हिन्दी-अंग्रेजी चैनल का यही हाल रहता है, रहेगा. 

कहने का सबब यह कि वहां अपना ज्यादा  वक्त लगाना मेरे लिए संभव नहीं होता. मेरी तो कोशिश होगी कि इन चुनावों के जरिए अपने देश एवं समाज के मौजूदा हालात और भविष्य की संभावनाओं पर विचार-विमर्श के लिए थोड़ा ज्यादा समय दे सकूं, कुछ सवालों का उत्तर तलाश सकूं. बहरहाल, चलिए देखते हैं कि इन पांच राज्यों में मतदान प्रतिशत कैसा रहा:

1. मणिपुर - 86 %
2. गोवा - 83 %
3. पंजाब - 77 %
4. उत्तराखंड - 66 %
5. उत्तर प्रदेश - 61 % 
  • हाँ, तो मतदान का यह प्रतिशत क्या दर्शाता है ? 
  • किस राज्य के लोग अपने मताधिकार के प्रति ज्यादा जागरूक और तत्पर हैं ? 
  • कहाँ के लोग लोकतंत्र के सच्चे सिपाही हैं? मणिपुर और गोवा या उत्तराखंड एवं उत्तर प्रदेश ? 
  • इसका उत्तराखंड एवं उत्तर प्रदेश जैसे प्रदेशों के पिछड़ेपन और इन राज्यों (पंजाब भी) में सदियों से फलते-फूलते भ्रष्टाचार से कोई लेना -देना भी है क्या ?
  • क्या मतदान के प्रतिशत का उन प्रदेशों के शिक्षा-साक्षरता, आम आदमी के सामान्य जीवन स्तर से कोई सीधा संबंध है?
  • 14 % (मणिपुर) से लेकर 39 % (उत्तर प्रदेश) वोट न देनेवाले लोगों को मतदान के लिए प्रेरित करने हेतु चुनाव आयोग सहित वहां की मुख्य राजनीतिक दलों की क्या भूमिका रही ?      

ज्ञातव्य  है कि 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव में मतदान का प्रतिशत केवल 57% था, जब कि देश के लगभग सारे पत्रकार व राजनीतिक नेता बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों की राजनीतिक समझ और जागरूकता का बखान करते नहीं थकते. आखिर ऐसा क्यों होता है ? 

....देश के समाज विज्ञानी और चुनाव आयोग के विशेषज्ञ इसे कैसे देखते हैं ?
....क्या कल यह विषय न्यूज़ चैनल पर बहस का बड़ा मुद्दा बनेगा?
....और आप का क्या कहना है?
                                                                             (hellomilansinha@gmail.com)
                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

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