Monday, May 30, 2016

यात्रा के रंग : रोमांच और अनुभव

                                                                                  - मिलन सिन्हा 
कहते हैं यात्रा में जाने का एक अलग रोमांच होता है; और यात्रा में जिज्ञासा का साथ हो, फिर तो अनेक अदभुत अनुभव व जानकारी हमें स्वतः मिल जाती है. चलते-चलाते  हमें कितने ही ऐसे लोगों से मिलने का मौका मिलता है; प्रकृति के कितने ही  अनजाने, अप्रतिम रूपों से रूबरू होने का सौभाग्य मिलता है, इसका पूर्वानुमान शायद ही कोई लगा सकता है. लेकिन न जाने क्यों और कैसे इस बार मेरे साथ यात्रा आरम्भ करने के साथ ही ये सब घटित होने लगा. निदा फाजली साहब ने यूँ ही तो नहीं लिखा :

धूप में निकलो, घटाओं में नहाकर देखो 
जिन्दगी क्या है, किताबों को हटाकर देखो .

एक लम्बे अंतराल के पश्चात्  रात में ट्रेन से यात्रा का योग बना. 'क्रिया योग एक्सप्रेस' चल पड़ी नियत समय पर रांची से हावड़ा (कोलकाता) की ओर. आरक्षित डिब्बे में यात्री अपने–अपने बर्थ पर जमने लगे. हमारे डिब्बे में 30-40 वर्ष के लोगों का एक ग्रुप चल रहा  था, जिनमे से दो सदस्यों का बर्थ हमारे आसपास था. उनके दो और साथी आ गए और उनके बीच रांची प्रवास की चर्चा चल पड़ी. बातों से पता चला कि वे लोग जिनमें कुछ महिलायें भी थी, एक सामाजिक समारोह में आये थे और अब कोलकाता लौट रहे थे. चर्चा के दौरान यह भी बात आई कि अगले कुछ दिनों में इस ग्रुप का रायपुर, गौहाटी आदि स्थानों में जाने का प्रोग्राम है. उनके बीच की प्रगाढ़ता और आसन्न प्रोग्राम के प्रति उनके उत्साह को देखते हुए उत्सुकतावश मैंने पूछा तो बगल में बैठे महेश जी ने बताया कि वे लोग राजस्थान के लक्ष्मणगढ़ के मूल निवासी हैं और अब कोलकाता में रहकर व्यवसाय आदि में सक्रिय हैं.  वे 'लक्ष्मणगढ़  नागरिक परिषद् ' के सक्रिय सदस्य है, जिसकी स्थापना 1987 में हुई और जिसका एक बड़ा मकसद लक्ष्मणगढ़ के प्रवासी लोगों को एक मंच पर लाना है तथा अपने सामाजिक कार्यों का विस्तार करना है. उन्होंने बताया कि उनके दो दिनों के प्रवास में उनको रांची में रहनेवाले करीब एक सौ परिवारों से जुड़ने का अवसर मिला. सच मानिए, उनसे बातचीत  करते हुए मुझे अच्छा लग रहा था क्यों कि समाज  में एकजुटता और भाईचारे को बढ़ाने का उनके इस प्रयास से मैं प्रभावित था. 

ट्रेन रफ़्तार में थी. घड़ी की सुई भी अपने रफ़्तार पर. आसपास के लोग सोने लगे, एक –दो लोगों ने बत्ती  बुझाने का आग्रह भी किया. लिहाजा बातचीत को विराम लगा. 

सुबह आंख खुली तो ट्रेन तेज गति से गंतव्य की ओर भागी जा रही थी और पीछे छूटते जा रहे थे हरे–भरे गांव, जहां पानी की कोई किल्लत नहीं दिखी. दस-बीस घर के साथ एक पोखर दिख जाता और दिख जाते उनमें तैरते बत्तख; उसके किनारे कुछेक पेड़-पौधे. जानकार कहते हैं कि पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों में आपको आम तौर पर ऐसे दृश्य दिखेंगे. 

हावड़ा स्टेशन आने से पूर्व रेल पटरी के दोनों ओर  गन्दगी का दीदार करते हुए हम स्टेशन पर समय से पहुंच गए. हाँ, ट्रेन के एसी -3 बोगी के रख-रखाव में कुछेक कमियों के अलावे कोई बड़ी असुविधा नहीं हुई. हावड़ा स्टेशन के प्लेटफार्मों की मरम्मत की जरुरत महसूस हुई. हजारों यात्री रोज इन प्लेटफार्मों से होकर गुजरते हैं; छोटी परेशानी कब बड़ी दुर्धटना का सबब बन जाय, किसे पता. बहरहाल, वर्तमान रेल मंत्री के सत्प्रयासों का असर तो कई मामलों में दिखा, आगे और दिखेगा इसकी उम्मीद है. ऐसे भी, इतने सालों में लगे मजबूत जंग से जंग के स्तर पर निबटना पड़ेगा, प्रभु जी. 

हावड़ा स्टेशन से बाहर निकलने पर देखा कि टैक्सी की प्री –पेड लाइन बहुत लम्बी थी, सुबह का वक्त जो था. ठहरने के स्थान पर जल्दी पहुंचने के दवाब में आरा (बिहार) निवासी  एक टैक्सी चालक की चालाकी का शिकार हुआ, जिसका सही –सही पता तब चला जब वह दोगुना किराया लेकर जा चुका था. दुःख कम था ये सोच कर कि चलो घी गिरा तो दाल में ही. नहीं समझे ? चलिए, कोई बात नहीं. हाँ, संतोष इस बात का था कि यादवपुर में रवि शंकर के आवास पर समय से ही पहुंच गया था, क्यों कि अगले दो घंटे में आगे की यात्रा के लिए कोलकाता एयरपोर्ट नियत समय से पहले पहुंचना था. जानकार कहते हैं कि कोलकाता में कब कहाँ जाम लग जाय, इसका पूर्वानुमान कोई नहीं लगा सकता. लिहाजा, थोड़ा फ्रेश होकर और रवि के परिवार वालों के साथ सुबह का क्वालिटी टाइम बिता कर निकल पड़ा एयरपोर्ट की ओर.


उमस, गर्मी एवं वायु प्रदूषण से हाल बेहाल था. अब भी टैक्सी के रूप में एम्बेसडर कार ही कोलकाता की पहचान है. पुरानी  डीजल एम्बेसडर गाड़ियाँ 30-35 किलोमीटर की रफ़्तार से  चली जा रही थी, भरपूर धुआं छोड़ते हुए. चौड़ी सड़क के दोनों ओर वही बेतरतीब कस्बानुमा रहन-सहन; बड़ी इमारत और झुग्गी झोपड़ी का साथ भी कहीं- कहीं. यह सब देखते –समझते आखिर पहुंच गए कोलकाता के नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर. यहाँ का नजारा बिलकुल ही अलग. आइये, देखें अन्दर क्या चल रहा है. 

                                                                                        

               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
                                                                                                  (hellomilansinha@gmail.com)
# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित

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