Sunday, February 1, 2015

गुड लाइफ : आइए, समाधान ढूंढ़ निकालें

                                                                                - मिलन  सिन्हा 
clip ऐसे अनेक उदाहरण हमारे आसपास मिल जायेंगे जहां हमें देखने को मिलता है कि दो कमोवेश समान व्यक्तित्व वाले लोगों में, घर हो या दफ्तर में, लोकप्रियता के ग्राफ में बड़ा अन्तर होता है। ऐसा क्यों होता है, इसे समझना आसान नहीं, तो बहुत मुश्किल भी नहीं है।  इसके लिये हमें बस इस  प्रकार के लोगों के व्यवहार को गौर से देखना-परखना पड़ता है; उनके कार्यकलाप व क्रिया-प्रतिक्रिया पर थोड़ी गहरी नजर रखनी पड़ती है। जल्द ही आप जान पाते हैं कि एक ही परिस्थिति में समस्याओं- मुश्किलों से निबटने का उनका नजरिया एवं तरीका जुदा -जुदा हैं। एक ओर पहला आदमी जाने -अनजाने समस्या को बड़ा बना कर प्रस्तुत करता है, उसे और जटिल बनाता है एवं फिर जाकर उसे सुलझाने का सामान्य प्रयास कर लोकप्रियता अर्जित करना चाहता है।  वहीं  दूसरा आदमी यह जानता और मानता है कि दुनिया में समस्याएं हैं और रहेंगी - उनकी संख्या एवं तीव्रता बेशक कम या अधिक हो सकती है, कई जाने -अनजाने कारणों से ; लेकिन,  मानव जाति के निरन्तर विकास का गौरवशाली इतिहास बताता है कि तमाम समस्याओं के बावजूद समाधान ढूंढ़ते हुए हम छोटे -बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करते रहे हैं। लिहाजा, वह उसी समस्या को शुरू से ही सुलझाने का हर संभव प्रयास करता है और अधिकतर मामलों में सफल भी होता है, परन्तु  उस सफलता का श्रेय लेना उसका ध्येय नहीं होता। 

ऐसा व्यक्ति घर -ऑफिस हर जगह खुले मन से ऐसे किसी अन्य व्यक्ति की मदद लेने का प्रयास भी करता  है जो उस मामले को सुलझाने में उससे बेहतर योग्यता व क्षमता रखता है। जाहिर है, इस प्रकृति के लोग सदैव खुद, अपनी संस्था  एवं अपने आसपास के लोगोँ के लिये अनेकानेक मुश्किलों, उलझनों तथा समस्याओं के बीच से समाधान का अपेक्षाकृत सरल रास्ता तलाशने में आनन्द का अनुभव करते हैं। दरअसल, ऐसे लोग  'सर्वे भवन्तु सुखिनः' के सिद्धान्त के पक्षधर हैं और इसी कारण  दूसरों की तुलना में ज्यादा सामाजिक, लोकप्रिय एवं सफल होते हैं।

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

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