Saturday, July 12, 2014

'पहले शौचालय' का सोच बनाम जमीनी हकीकत

                                                                                    - मिलन सिन्हा
indian toiletप्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित देश के कई अन्य प्रभावशाली नेता समय समय पर किसी न किसी मंच से देश में ‘पहले शौचालय’ की चर्चा करके अपनी अपनी चिंता व्यक्त करते रहे हैं। लेकिन बावजूद इसके आकड़ों व तथ्यों पर गौर करें तो शौचालय से जुड़ी समस्या वाकई बेहद सोचनीय है। कहिये, क्या यह शर्म के बात नहीं है कि बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, ओडिशा जैसे बड़े राज्यों में 60 % घरों में शौचालय की बुनियादी मानवीय सुविधा आजादी के 66 बाद भी उपलब्ध नहीं है ?

थोड़ा ठहर कर उन बीमार, बुजुर्ग, महिलाओं, लड़कियों व बच्चों की स्थिति के बारे में सोचिये जिनके घर में शौचालय नहीं है जब कि सरकार कहती है कि एक शौचालय बनाने में 10900 रूपए का खर्च आता है जिसमें 10000 रूपया सरकार देती है और सिर्फ 900 रुपया लाभुक को देना पड़ता है।

क्या हमारे उन नेताओं, मंत्रियों, सरकारी अधिकारियों ने, जो चीख-चीख कर गरीब, शोषित व साधनहीन जनता के प्रति संवेदनशीलता की दुहाई देते हैं, कभी सोचा है कि शाम को किसी गांव से गुजरती सड़क के किनारे शौच के लिए बैठी महिलाओं व लड़कियों की क्या स्थिति होती है जब दूर से आती किसी मोटर वाहन की लाईट देखते ही वे अचानक किस बेवशी में उठ खड़ा होने को मजबूर होती है; उन बच्चियों को कैसा लगता होगा जिन्हें उनके विद्यालयों में शौचालय आदि की सुविधा नहीं होने के कारण स्कूली शिक्षा से वंचित रहना पड़ता है ? क्या यह ‘राइट टू एजुकेशन’ के सिद्धांत की सरकारी अवहेलना नहीं है ?

हाल ही में यूनिसेफ एवं लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग द्वारा ‘सेनिटेशन एंड हाइजीन एडवोकेसी एंड कम्युनिकेशन स्ट्रेटेजी’ विषय पर पटना में आयोजित सेमिनार में बिहार के लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण मंत्री ने मुख्य अतिथि के रूप में भाग लेते हुए कहा कि बिहार वर्ष 2020 तक खुले में शौच से मुक्त होगा। बड़ा सवाल यह है कि जब राज्य सरकार को यह ज्ञात है कि (विशेषकर) गांव की गरीब महिलाओं व बच्चियों की मर्यादा, गरिमा, स्वास्थ्य एवं शिक्षा के लिए शौचालय का न होना कितना बड़ा अभिशाप है, तब इस कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर अधिकतम दो वर्षों में पूरा करने का संकल्प लेने के बजाय 2020 तक करने के बात कहना क्या दर्शाता है ?

सोचने वाली बात है कि अगर जनभागीदारी एवं समावेशी विकास के सिद्धान्त पर अमल करते हुए सिक्किम, केरल व हिमाचल प्रदेश इस सामजिक बुराई से निबटने में उल्लेखनीय सफलता दर्ज कर सकते हैं तो बाकी राज्य क्यों नहीं ? बिहार को तो इस मामले में सबसे आगे रहना चाहिए, आखिर यहीं से तो चार दशक पहले सुलभ शौचालय अभियान शुरू हुआ था जो आज देश-विदेश में मजबूती के साथ आगे बढ़ रहा है।

खबर है कि ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ नारे के साथ केन्द्र में सत्तारूढ़ मोदी सरकार में सार्वजनिक शौचालयों के साथ हर घर में शौचालय बनाने पर जोर दिया जाएगा, जिसके लिए अपेक्षित वित्तीय मदद भी मुहैया कराई जाएगी। स्वच्छता के साथ शुद्ध पेयजल को उच्च प्राथमिकता देने के भी साफ़ संकेत हैं। लेकिन पूरे मामले में राज्य सरकारों की भूमिका तो महत्वपूर्ण रहेगी ही, साथ ही रहेगी अहम भूमिका हर प्रबुद्ध नागरिक, सामाजिक संगठनों व समाचार माध्यमों की, क्योंकि बिना व्यापक जनजागरण एवं जन सहभागिता के ऐसे अभियान को तीव्रता से लक्ष्य तक पहुंचाना कठिन तो है ही।

                   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
#  प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित

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